मुरेलखुर्द (Murelkhurd), मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल है। यह स्थान मुख्य रूप से अपने प्राचीन बौद्ध स्तूपों के लिए जाना जाता है, जो सांची के प्रसिद्ध स्तूपों के निकटवर्ती क्षेत्र में स्थित हैं।
यहाँ मुरेलखुर्द के इतिहास का संक्षिप्त विवरण दिया गया है:
1. प्राचीन बौद्ध केंद्र
मुरेलखुर्द का इतिहास ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी (2nd Century BCE) से शुरू होता है। मौर्य और शुंग काल के दौरान, सांची के आसपास के क्षेत्र में बौद्ध धर्म का अत्यधिक प्रभाव था। सांची एक मुख्य केंद्र था, लेकिन उसके चारों ओर सोनारी, सतधारा, अंधेर और मुरेलखुर्द जैसे छोटे बौद्ध परिसर विकसित हुए थे।
2. स्तूपों की खोज और संरचना
मुरेलखुर्द में पहाड़ियों पर स्तूपों का एक समूह स्थित है।
अलेक्जेंडर कनिंघम: 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस स्थल का अन्वेषण किया था।
स्तूपों की संख्या: यहाँ लगभग 37 स्तूप पाए गए थे, जिनमें से कुछ काफी बड़े और कुछ छोटे थे।
मठ (Monasteries): स्तूपों के पास ही भिक्षुओं के रहने के लिए विहारों या मठों के अवशेष भी मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यहाँ एक समय में एक जीवंत बौद्ध समुदाय निवास करता था।
3. धार्मिक महत्व
इतिहासकारों का मानना है कि इन केंद्रों का निर्माण केवल धार्मिक श्रद्धा के लिए ही नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी किया गया था। ये स्थल प्राचीन व्यापारिक मार्गों (Trade Routes) के करीब थे, जिससे व्यापारियों और यात्रियों को विश्राम और आध्यात्मिक शांति मिलती थी।
4. वर्तमान स्थिति
समय के साथ, रख-रखाव के अभाव और प्राकृतिक कारणों से कई संरचनाएं क्षतिग्रस्त हो गई हैं। हालांकि, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इनमें से कई स्थलों को संरक्षित किया है। आज यह स्थान उन पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए एक खजाना है जो सांची की भीड़-भाड़ से दूर शांति और इतिहास की गहराई को खोजना चाहते हैं।
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